sudesh zakhmi
Thursday, August 7, 2014
क्यों उदासी का मंजर है बतलाईये
क्यों उदासी का मंजर है बतलाईये
दिल तुम्हारा है ये घर ना घबराईये
कौन रोकेगा अश्कों को बहते हुये—
मेरी आंखों मे आकर समा जाईये।।
डा0सुदेश यादव जख्मी
कवि/पत्रकार
Thursday, July 31, 2014
जख्म हंसकर वो देते हैं
जख्म हंसकर वो देते हैं,जख्म सिलने नहीं देते
कत्ल नजरों से करते हैं नजर मिलने नहीं देते
गजब अंदाज है इनका खुदा इनसे बचा हमको—
शिकायत क्या करे कोई,जुबां हिलने नहीं देते
डा0सुदेश यादव जख्मी
साहित्यकार/पत्रकार
बहुत उदास है मन आ जाओ
बहुत उदास है मन आ जाओ
याद में जलता है बदन आ जाओ
हसरतों और न तडफाओ मुझे—
हो भी जाने दो मिलन आ जाओ
डा0सुदेश यादव जख्मी
साहित्यकार/पत्रकार
Friday, February 28, 2014
प्यार करता हूं मैं तुमसे
मुक्तक
प्यार करता हूं मैं तुमसे मगर मैं कह नहीं सकता।
चाहकर दूर भी तुमसे मगर मैं रह नहीं सकता।।
मैंने माना तू है नदिया,और मैं तो किनारा हूं—
मैं चाहूं भी अगर तो साथ तेरे बह नहीं सकता।।
Friday, February 14, 2014
गजब अंदाज
मुक्तक
जख्म हंसकर वो देते हैं जख्म सिलने नहीं देते।
कत्ल नजरों से करते हैं नजर मिलने नहीं देते।।
गजब अंदाज है इनका खुदा इनसे बचा हमको—
शिकायत क्या करे कोई जुबां हिलने नहीं देते।।
डा0 सुदेश यादव जख्मी
कवि/पत्रकार
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